Deepesh Jha

DARBHANGA

25-07-2012

10:50pm

उपरवाला चाहे तो….. किसी भी मोड़ पर , अर्शो से बिछड़े मिल जाते है!
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आज कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ,
जब एक दोस्त लगभग ८ बरस बाद मुझे … मधुबनी के रेलवे स्टेशन पर मिला !
(रतन)…
यु तो एक दुसरे को देखते रहे हम„,
फिर एक दुसरे की पहचान हुई …. वो पल हमरे लिए बेहद खास था …..
मै तो उसका नाम भी भूल गया था , लेकिन उसे मेरा नाम याद था!
उसके मिलने से मुझे एक और पुराने दोस्त का (प्रवीन) का मोबाइल
नंबर मिला !!!
आज पूरा दिन मै बेहद खुस था !!!
…………क्योकि दोस्ती के रिश्ते को मै बहुत अहमियत देता हुआ !!!
मेरे लिए मेरे दोस्त बेहद खास है!,
आशा करता हु की कल मेरी प्रवीन से बात हो सकेगी !!
शुभ रात्रि ….

DARBHANGA

25-07-2012

जाने क्यों मैं सोचता रहता हूँ  की मेरी ज़िन्दगी की अगली कड़ी क्या होगी….
कहा लेकर जाएगी ये ज़िन्दगी मुझे…
खैर मै ज़यादा परेशान भी नहीं रहता हूँ !!!!
………….
अभी मै २२ साल का हूँ!
जाने कितने दोस्त बने मेरे ज़िन्दगी में, जब कभी सोचता हूँ अपने पिछले १० सालो के
बारे में तो „, जाने क्यों मै ठहर सा जाता हूँ , वो बीते पल, वो पुराने दोस्त के खयालो में
खो जाता हूँ !!
वो पल और शायद मेरे पुराने कुछ दोस्त जो अब मुझे फिर कभी नहीं मिलेंगे, सोचकर दिल को
बहुत आहात सी पहुचती है !!
अपने बचपन में सभी को शायद जल्दी से बड़े (युवा) होने की चाहत होती है!!!!
अफ़सोस की बचपन के पल जब याद आते है तो आप कुछ भी नहीं कर सकते, सिवाई आँखे नम करने के ..

संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है कि गुणी लोगों की गिनती में, किसी बेटे का नाम अगर पहली ऊँगली से आगे चला जाए और उस की माँ भी “बेटे-वाली” कहलाये तो पुत्र-हीन कैसी होती होगी ? आज़ाद एक ऐसा नाम है जिसे हिन्दुस्तान का ज़मीर जब भी जबान पर लाता है अन्दर ख़ून अपने स्वाभिमान की लहरें गिनना शुरू कर देता है ! चार गज कपडा,जनेऊ और एक पिस्तोल इन पहचानों के साथ उन्होंने देश पर मरने वालों के लिए एक मानक तय किया कि इस से ज्यादा साधन सर्वोच्च-सेवा के लिए भी आवश्यक नहीं ! आज उनका जन्म-दिन है ! ऐसे नायक को प्रणाम करने के लिए किसी-किसी देश की शताब्दियाँ तरसती हैं ! समय बदला है हालात नहीं बदले ! हमें हिम्मत देना हे पूज्य पितृव्यवर ! कि वक़्त पड़े तो खुद अपना हाथ भी अपने ही प्राणों का लीला-कमल माता के चरणों में चढाने से ज़रा न हिचके ! कवि आज़ाद के ही शब्दों में …
“अभी शमशीर कातिल ने, न ली थी अपने हाथों में ,
हजारों सिर पुकार उठे, कहो दरकार कितने हैं…….” जय हिंद !